Wednesday, March 13, 2013

गलियारा


गुमान रहा ज़िन्दगी पर बहुत कुछ किया
मेरे साथ बस मेरा वजूद ही रहा

छूटते हुए नज़ारे हवाओं से रुके कुछ
जालसाजी की भीड़ में अच्छे बचे कुछ
बस एक रूह का निशाँ ही रहा

राग-बैराग तरंगे रहती हैं आसपास
पानी के छींटों में और सूखे के साथ
सरगर्मियों से आखिरी तक लड़ता रहा

यादें बहुत सी सिरहाने पर सहेजी थी
मगर वक़्त की उन पर बड़ी बेरुखी थी
झूठी आस से जीवन बढ़ता गया

आग का क्या है जलेगी और जलाएगी
ये तो वक़्त है इसकी मार बड़ी सताएगी
सोचने से क्या मिला जो सोचता ही रहा

रंगहीन किस्से और कुछ कड़वे सच
रखती है शामें मेरे शामियाने में अब
मैं हूँ जो नींद से ज़िद करता रहा

गफ़लत में है सांस कि एक आसरा है
घर तो छूट चूका है बस एक गलियारा है
सबसे दूर खुद से मिलने को चलता रहा

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'



लफ्ज़



भरे हुए लफ़्ज़ों से नज़्म बनती है
खाली तो ये सारे चेहरे हैं

आँच से बचता फिरता रहा मैं
कभी उठता कभी गिरता रहा मैं
हर एक कदम पर पहरे हैं

अभी ही तो आया हूँ सहरा के दर से
पटकने लगा हूँ मैं सर को ही सर से
सवालों से घिरकर अकेले हैं

बहुत तलाशा बहस की जड़ों को
कहूँ भी तो क्या मेरे फैसलों को
हम भी जगह पर ठहरे हैं

साजों की महफ़िल सजा तो रखी है
मगर ग़म की रातें दबाकर रखी हैं
राज़ दिलों के भी गहरे हैं
 
पलटते नहीं है ये लम्हों के मरहम
सांचे ढलता रहा है ये मौसम
दिन काले हैं या सुनहरे हैं

बंद करो इस फ़िज़ूल की बकवास को
सुनाऊंगा कहानी इसकी भी बाद को
अभी तो जाने के फेरे हैं

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'

जीवन-सार



क्या देखा क्या सुना सभी बेकार है
समय की धार है समय का वार है

रिक्त स्मृतियाँ मष्तिष्क में पड़ी हैं
उनका भी अपना एक संसार है

बुझते दिए हाथों की ओट से जल गए
कई प्रकाशों से जीवन चमकदार है

बेलगाम रात या फिर लड़खड़ाती सुबह
रोज़ जब दर्द हो तो इन्ही का इंतज़ार है

पथ के साथी लक्ष्य से भटक चुके हैं
उन्हें गंतव्य में लाने को हम तैयार हैं

कई वर्षों से सुप्त हो चुकी थी शिराएँ
अब व्यथित नसों में रक्तरंजित धार है

विचलित है मन की व्यथाएं रोज़ भी
कर्कश है समय कभी , कभी मधुर रसधार है

चिंता , प्रसन्नता ,सुख और दुःख की बूटी रहेगी
अंततः समझ आया यही जीवन -सार है

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'

ये कैसा शहर



ये शहर भी देखो बड़ा परेशान है
कि हादसों से जैसे आदमी की पहचान है

कुछ ज़ख्म तो अभी-अभी भरे थे
दूसरे पल देखा तो एक नया निशान है

कई शख्स छुपे हुए है यहाँ इंसानों के भेस में
मगर हमें क्या पता वो तो शैतान हैं

अभी आये है मोहल्ले में सभी दिए जलाने को
मगर धधकती आँच से हर कोई अनजान है

बेरहम सरकार भी शोक बस जताती है
शोक तो रहेगा ही जब मर रहा इंसान है

बिना वजह गया था मेरा अपना बाज़ार में
मुझे खबर नहीं थी कि वो उसका आखिरी सलाम है

ज़िन्दगी भी आदतन यूँ रही है अब गुज़र
कि मौत भी अब लग रही इस तरह आसान है

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'

राख़


फुर्सत का एक भी लम्हा न निकाला
मैंने ज़िन्दगी से कितना दगा किया

कितने पहर अर्जियां लगाई थी सुकून की
मगर कैसी है ये दास्ताँ मेरे जूनून की
कि वक़्त ने जब हमसे किनारा कर लिया

कुछ इस तरह जमे हुए थे पैर ज़मीं पर
की दौड़ते हुए कोई बैठा हो कहीं पर
मगर फिर भी मंजिलों का निशाँ मिटा

बेफ़िक्र सी हालत अब कहाँ रह गई
साथ हवाओं के वो भी यहाँ बह गई
तूफाँ को जैसे एक सहारा हुआ

मंद-मंद मुस्कुराते हालात मेरे दर्द पर हँसते हैं
इन्ही चालबाजियों में हम रोज़ फंसते हैं
अब कहाँ जाएँ कि बचने का कोई रास्ता नहीं मिला

बुनी हुई यादों के चादर ओढ़ते हैं
रोज़ कुछ न कुछ पुराना सोचते हैं
ये सफ़र जैसे कोई राख़ का ढेर बना

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'






किस्सा



देखते ही देखते जाने कितने पास हो गयी
दूर कहीं पर एक चुप्पी थी जो बाद में आवाज़ हो गयी

सूरत-ए-हाल पर खफा क्या होऊं
तबीयत भी अब गर्ममिजाज हो गई

बाशिंदे बहुत हैं यहाँ पर सूखी गली के
उनकी किस्मत भी देखो तो लाजवाब हो गयी

एक मैं ही हूँ जो नालायकी का तमगा पहने हूँ
बाकी सबकी मंजिले तो बड़ी साफ़ हो गई

सभी कहते हैं कि किसी की तरक्की को नापसंद मत करो
मगर अपने लिए तो दुनिया जैसे राख हो गई

अच्छे दिन थे और सोच भी बड़ी अच्छी थी
मगर न जाने ज़िन्दगी क्यों इतनी नापाक हो गई    

ख़त्म हुआ ये किस्सा अब निकलता हूँ कहीं और
भूल जाना इस घडी को ; ज़िन्दगी की रात हो गई

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'





बेहाल



क्या दौर आया है रंजिशों का
की मुस्कुराने से भी दर्द बहता है

हकीकत कहूँ या ख्वाबों की महफ़िल
ज़िन्दगी में हो चुकी है बहुत सी मुश्किल
कौन चेहरा छुपाए अपने घर में रहता है

साँस का साथी अब तन्हाई का आलम है
हुआ कुछ नहीं बस धुंधला सा मौसम है
इसी तरह अब मेरा हर दिन गुज़रता है

माहौल बना मुसाफिर मेरे कारवां से
सारे लफ्ज़ बिखर चुके हैं मेरी दास्ताँ से
ये लम्हा भी अब मुझसे नाराज़ रहता है

कारनामे क्या हैं बस काली सी रंगत
मिली नहीं अभी तक झूठ से फुर्सत
वक़्त अब सच छुपाने की शर्त रखता है

कामगार शख्सियत की ज़रूरत रहेगी
मगर इसमें भी एक सूरत रहेगी
अगर कोई चालबाज़ी का मुखौटा पहनता है

आया मुसाफिर कितनी दूर मंजिल से वापस
कई शिकवे किये मगर फिर भी है बेबस
उसे रास्ता छोड़ने का अफ़सोस रहता है

चलो खैर जो भी हुआ मुनासिब नहीं था
घटते हुए हालातों से मैं वाकिफ नहीं था
अब तो हर दिन धीरे से निकलता है

परवाह नहीं है खुद से जुड़े मसलों की
गुफ्तगू ख़त्म हुई बेकार सी शर्तों की
शख्सियत में बेहाली  का अजाब रहता है

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'




मेरी सुबह को लोग रतिया समझते हैं ....

मेरी सुबह को लोग रतिया समझते हैं  पेड़ की शाखो को वो बगिया समझते हैं  कद्र कोई करता नहीं गजलों की यारों  सब खिल्ली उड़ाने का जरिया समझते हैं...