Friday, March 22, 2013

सब्र ज़िन्दगी का

कुछ नाम लिखे थे कागज़ में
कुछ मिट गए कुछ रह गए

साज़ छेड़ने गए हम शहर में
बेरंग लौटे वहाँ से घर में
वहाँ कुछ सिसकते गीत गाए
कुछ अश्कों के संग बह गए

अजब सा माहौल है इस हसीन शाम का
शामिल हर शख्स यहाँ बड़े नाम का
पर कोई नहीं है साथ खुद के
सब अपने दर्द को छुप कर सह गए

वजूद भी खो गया मेरा अपना
ढूंढा उसे दर-ब-दर कितना
आशियाँ था जो भी मेरा दुनिया में
उसके ज़र्रे भी आंधियों से ढह गए

महफूज़ है सारे लम्हे यादों में
पर दम तोड़ रही है रोशनी चरागों में
कोई नहीं है मेरा हमकदम यहाँ
सिर्फ मैं और मेरा दर्द तन्हा रह गए


बस!बहुत बर्दाश्त कर लिया ग़मों को
अब आने दो इन ख़ुशी के मौसमों को
सब्र ज़िन्दगी का हम झेलते रहे
सोचते हैं की सारे लम्हे बेवजह गए

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'


Thursday, March 21, 2013

तस्वीर



मंजिलों की तलाश में इधर -उधर भटकता हूँ
क्या है मेरी हकीकत इसी सोच में आजकल रहता हूँ

ग़मगीन चेहरा और गहरी उदासी
ज़रूरत है आंसुओं की ज़रा सी
ऐसे ही एहसास अब दिखाकर चलता हूँ

तकल्लुफ़ भरा ये मंज़र मुझसे बिछड़ता नहीं
मेरा ज़मीर अब मुझसे लड़ता नहीं
कि आजकल मैं झूठ के नकाब पहनता हूँ

एक रंग से मैं कभी नहीं रंगता
हज़ारों से भी  मैं नहीं बनता
क्योंकि मैं हर समय शख्सियत बदलता हूँ

दिमाग में कुछ था पर कहा कुछ और
कौन करेगा अब मेरी बातों पर गौर
कि मैं भी अब  धोखे से बच  निकलता हूँ

एक डिबिया काजल की अपने पास रखी है
उसी पर सभी की निगाहें लगी हैं
क्योंकि उसीमे अपनी तस्वीर रखता हूँ

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब '


Wednesday, March 20, 2013

हवाओं से गुज़ारिश




हवाओं से गुज़ारिश है कि वो बहती रहें,
मौसम से यूं ही गुफ्तगू करती रहें।

मिज़ाज कुछ रूखा सा है, मेरे अक्स का,
कि अपनी ख़ैरियत का ये वास्ता देता है।
ये गौर करने वाली बात है कि मेरा जुनून ही मुझे दिलासा देता है।
फिर चाहे कितनी ही मुश्क़िलें बढ़ती रहें।

कुछ लफ्ज़ हैं जो बेबसी के पन्नों में दबे हैं,
उन्हें पलटकर देखना बहुत ज़रूरी है।
किसकी फिराक़ में घूमता है मेरा जज़्बा,
हौसलों के बगैर उसकी राहें अधूरी हैं।
कुछ इसी तरह से मंज़िलों की तलाश चलती रहे।

कोई साया पलकों के घर में बंद रहता है,
उसे खुले आसमान से महफूज़ रखना है।
धुंधली पड़ी हुई यादों की रोशनी को,
ज़िंदगी के अंधेरे में महसूस करना है।
बस इसी तरह दिनचर्या चलती रहे।

ये फलसफा है कि ग़मों को अपना साथी कहो,
फिर किसी और के मोहताज क्या होंगे।
जो फ़ासले बढ़ चुके हैं हमारे दरम्यान,
उनसे हालात फिर नाराज़ क्या होंगे।
उसी से ये ज़िंदगी संवरती रहे।

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'






ज़िन्दगीनामा


ज़िन्दगी मैंने तुझसे बहुत कुछ है पाया
तेरी ही धुन पर ये सारा गीत है बनाया

धूप के क़तरे का निशाँ ढूंढता था
खोई मंजिल का धुआं ढूंढता था
पर मिला घने अँधेरे का साया

छाँव की चाशनी मिलती तो बात थी
फ़लक से रोशनी गिरती तो बात थी
मगर यादों ने दिल को कड़वा बनाया

उखड्ती हुई एक आवाज़ आई
दिलों के दरों की वो एहसास लाई
उसी में तेरा गीत मैंने है पाया

किस्सों के पन्ने भी उड़ से गए हैं
बेदर्द साए भी जुड़ से गए हैं
उन्ही के ग़मों ने हमें है सताया

टूटी खिड़की से जब हम देखते हैं
धूलों की बारिश में दिन खेलते हैं
ये मौसम न जाने कहाँ से है आया

लहर जो ख़ुशी की आगे बढ़ी थी
मगर उसके आगे अश्कों की झड़ी थी
उसी वक़्त आगे अँधेरा था छाया

बूदों के पैमाने को पीते गए हम
ख्वाबों के ज़ख्मों को सीते गए हम
ये सोचते हैं हमने यहाँ क्या लुटाया

न रंगों की रुत है न नरमी का मौसम
हुआ बाग़ों के घर में कलियों का मातम
हर एक फूल को राह से जब हटाया

वक़्त जो गुज़रा था कल की सुबह से
यहाँ रात आई उसी की वजह से
मेरे दर्द का घेरा उसने बढाया

कहीं गलियारों में मेरी परछाई सूखी है
वहीँ की दीवारों में तन्हाई रुकी है
उसी ने मेरे दिल में घर है बनाया

राजेश बलूनी ' प्रतिबिम्ब '



उम्मीदें


एक बुझती हुई चिंगारी को हवाएं चिराग बना देती हैं
वीरान रहता है जो चमन उसे कलियां बाग बना देती हैं

बिखरी हैं जो पंखुड़ियां मिट्टीं मे कंकड़ बन कर
पसीने की दो बूंद उन्हे गुलाब बना देती हैं

झोंका सा कुछ आ गया कहीं पर कभी तो
फ़िज़ाएं उसे अपनी अदायगी से अज़ाब बना देती हैं

उजली सी किरण सुबह की निकलती है कहीं पर तो
वक़्त की सुइयां उसे आफताब बना देती हैं

कुछ पन्ने खाली होते हैं ज़िन्दगी की कहानी में
मगर लम्हों की दास्तान उन्हे किताब बना देती हैं

कई हसरतें दिल में यूं ही बस जाती है
उनको पाने का जुनून उन्हे ख्वाब बना देती हैं

अपने खराब वक़्त पर अफ़सोस कभी मत करना
सब्र और हिम्मत उसे लाजवाब बना देती हैं

जब भी कभी चुप्पी घर करने लगे दिल में
एक छोटी गुफ्तगू उसे आवाज़ बना देती हैं

कभी कभी ज़िंदगी का साज़ बेसुरा हो जाता है
पर उम्मीदों की सरगम उसे नया राग बना देती हैं

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब '

Wednesday, March 13, 2013

गलियारा


गुमान रहा ज़िन्दगी पर बहुत कुछ किया
मेरे साथ बस मेरा वजूद ही रहा

छूटते हुए नज़ारे हवाओं से रुके कुछ
जालसाजी की भीड़ में अच्छे बचे कुछ
बस एक रूह का निशाँ ही रहा

राग-बैराग तरंगे रहती हैं आसपास
पानी के छींटों में और सूखे के साथ
सरगर्मियों से आखिरी तक लड़ता रहा

यादें बहुत सी सिरहाने पर सहेजी थी
मगर वक़्त की उन पर बड़ी बेरुखी थी
झूठी आस से जीवन बढ़ता गया

आग का क्या है जलेगी और जलाएगी
ये तो वक़्त है इसकी मार बड़ी सताएगी
सोचने से क्या मिला जो सोचता ही रहा

रंगहीन किस्से और कुछ कड़वे सच
रखती है शामें मेरे शामियाने में अब
मैं हूँ जो नींद से ज़िद करता रहा

गफ़लत में है सांस कि एक आसरा है
घर तो छूट चूका है बस एक गलियारा है
सबसे दूर खुद से मिलने को चलता रहा

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'



लफ्ज़



भरे हुए लफ़्ज़ों से नज़्म बनती है
खाली तो ये सारे चेहरे हैं

आँच से बचता फिरता रहा मैं
कभी उठता कभी गिरता रहा मैं
हर एक कदम पर पहरे हैं

अभी ही तो आया हूँ सहरा के दर से
पटकने लगा हूँ मैं सर को ही सर से
सवालों से घिरकर अकेले हैं

बहुत तलाशा बहस की जड़ों को
कहूँ भी तो क्या मेरे फैसलों को
हम भी जगह पर ठहरे हैं

साजों की महफ़िल सजा तो रखी है
मगर ग़म की रातें दबाकर रखी हैं
राज़ दिलों के भी गहरे हैं
 
पलटते नहीं है ये लम्हों के मरहम
सांचे ढलता रहा है ये मौसम
दिन काले हैं या सुनहरे हैं

बंद करो इस फ़िज़ूल की बकवास को
सुनाऊंगा कहानी इसकी भी बाद को
अभी तो जाने के फेरे हैं

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'

मेरी सुबह को लोग रतिया समझते हैं ....

मेरी सुबह को लोग रतिया समझते हैं  पेड़ की शाखो को वो बगिया समझते हैं  कद्र कोई करता नहीं गजलों की यारों  सब खिल्ली उड़ाने का जरिया समझते हैं...