Monday, April 22, 2013

ज़द्दोजहद



चलेगी ये गाडी यूँ ही
न चले तो फिर भी चलाना होगा
ज़िन्दगी अगर ठोकर मारे तो
इसी से जी लगाना होगा

कई ख्वाहिशें रोज़मर्रा के मौसमों में दब जाती है
झरनों से बहती नदियाँ रास्तों से भटक जाती हैं
कभी तो इन्हें अपनी दुनिया मिलेगी
इसी आस में आंसुओं को मोती बनाना होगा

बदनाम वो नहीं जो सड़क पर रहता है
बदनाम वो है जो घर से बेघर रहता है
सभी अंधेरों को कुचलने के लिए हमें
किरणों के रथ को सजाना होगा

ढूंढते रहोगे मगर ज़िन्दगी सच्चाई में ही होगी
कितना भी धुआं होगा एक दिन तो रौशनी साफ़ होगी
जीने की तमन्ना है जिन सभी को
उन्हें जली रोटियों को भी चबाना होगा

कभी कडवे कभी मीठे एहसास होंगे बेहद
पर क्या करें यही है ज़िन्दगी की ज़द्दोज़हद
परेशां दिल को तसल्ली देकर हमें
किसी भी तरह समझाना होगा

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'

Tuesday, April 16, 2013

मौत का सुकून





साँसों का  पुलिंदा दिल में बोझ बनाता है
ठंडे से फर्श पर बिखरती है जब ज़िन्दगी
वक़्त के आईने में घूमता एक मंज़र
यादों के भंवर को पुकारता है
नम आँखों से फिर कोई चार बूँद गिराए
मौत का वो सुकून फिर मेरे पास आए

एक तारा फलक का तन्हा रात गुज़ारे
भीनी दर्द की खुशबू से शाम यूँ महके
कि कोई सिरा नहीं मिलता ;न खोता ही है
बोझिल साँसों का घर जिसमे बेदर्द ज़िन्दगी रहती है
बेचेहरा सी उम्मीद भी मुझसे दूर जाए
मौत का वो सुकून फिर मेरे पास आए

पलकों के तकिये में कोई ख्वाब बिखरा था
अश्क भी फ़ैल जाए और शोर भी रुक जाए
धूप का शामियाना लिपटे मेरे अक्स में
जब रंज के पन्नों में अनकही हो मेरी
कुछ इसी तरह से ग़मों का धुआं बह जाए
मौत का वो सुकून फिर मेरे पास आए

लहरे खामोश हों और लफ्ज़ जम जाएँ
यूँ ही बर्फ के ढेर में सुलगे चांदनी
छाँव से झुलसती हो जब भीगी पलकें
सूरज से नज़रों कि मुलाक़ात न हो
और शहर से फिर कोई रात को बुलाए
मौत का वो सुकून फिर मेरे पास आए


राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'


















Friday, April 12, 2013

उमस




शाम से मंज़र बुरा तो है
आ गई है रात अब हुआ क्या है

आधी -अधूरी साँसों का मतलब
जीवन गुज़ारा किताबों की शह में
बारिश हुई जो फिर भी जला है

आवाज़ आई कि गुम हो गया हूँ
जाने कहाँ खो गई है ये रंगत
कहता है मन ये कोई सिरफिरा है

चाक़ू की धार का तेज़ होना
काफ़ी नहीं हैं ये पैने इरादे
उलझते हुए क्या ये सोचा हुआ है

उमस बन रही है बूंदों के घर में
ठण्डी फुहारों को अब भूल जाओ
गर्मी का मौसम उबल जो रहा है

खारिश हुई भी तो दर्द बोलता है
मीठी चुभन भी दगा दे गई जो
बेमन से दिल का बुरा ही हुआ है


राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'

Wednesday, April 10, 2013

वक़्त



वक़्त के चेहरे पर झुर्रियां पड़ गई  हैं
वो धीमे से गुज़र रहा है
ये रफ़्तार इतनी धीरे क्यों है
जो कछुवे कि चाल सा चल रहा है

मेरे सपना भी औंधे मुंह गिर गया
पर इसका दोष भी मेरे सिर गया
इसीलिए मुझे अपना जीना खल रहा है

क्या हो जाए अगले पल में ये वक़्त कि रज़ा है
इसी के इशारे पर चलेंगे तभी इसका मज़ा है
क्योंकि इसका जायका हर घडी बदल रहा है

थक हार कर हम इस फैसले पर आए
कि बचे खुचे पल अब कहीं न जाएं
शायद मेरी पलकों में कोई नया सपना पल रहा है

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'

बेख्याली


मंजिले कुछ इस तरह मुझसे नाराज़ हो गयी
कि रास्ते भी नहीं जानते अब कौन सा सफर है

चाँद की स्याही से लिखी हुई दास्तां है
छूटता नहीं ये ज़िन्दगी का निशाँ  है
इस बात से मेरा दिल बेखबर है

जंजाल में लटकी और कटती यादें
भूल से पीछे के रास्ते से आये
मेरे ज़हन में अब इनका घर है

सुलगते छींटे पड़े तो गर्म ज़ुबानी हो चली
आँका नहीं हिसाब से और परेशानी हो चली
कहीं खाते में जोड़ तोड़ है , कहीं बहुत गड़बड़ है

बिलखती सोच मरती रातों पर रोती है
अँधेरे की एक डोर बेख्याली से सर नोचती है
जहाँ जहाँ है ज़मीं है वहीँ टिकी अब नज़र है

खिसियाते रहे कि आराम का ठिकाना नहीं है
भूख, प्यास को छोडो यहाँ जीने का ज़माना नहीं है
कुछ इस तरह ज़िन्दगी हो रही बसर है

मिर्च का गट्ठर और बूंदों की दरकार है
नमक का एक झरोखा और उबलती दीवार है
यूँ ही कुछ बेस्वाद सा अपना ये शहर है

लम्हे बेधड़क हैं और रंजिशों की ठौर है
कहानी अभी ख़त्म नहीं इसके बाद और है
अभी मौत आने दो कि ज़िन्दगी का डर है


राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'



Tuesday, April 2, 2013

बीमार शहर




शहर में आज कुछ शोर सा हो रहा है
ज़ुबानों पर कोई गीत बिलख कर रो रहा है

फ़िज़ाओं मे फैला हुआ है दहशत का धुआँ
उजड़ कर बिखर चुके हैं सबके आशियाँ
सिसकियां आ रही हैं हर किसी की आवाज़ से
बेबस है यहाँ पर हर एक इंसाँ
ये कैसा आलम है जो ज़िंदगी खो रहा है

ज़मीन पर फसल नहीं अब कब्र होती है
इंसानियत यहाँ पर अब बेसब्र होती है
कहीं नहीं है इत्मीनान की नींद आँखों में
जीने की ख्वाहिशें अब बेदर्द होती हैं
वो कौन सा बागबाँ है जो मौत बो रहा है

उम्र तो नयी है मगर सोच यहाँ बुजुर्ग होती है
चेहरे पर मुस्कुराहट नहीं; मायूसी बड़ी सुर्ख होती है
रहते है सब अपने वतन की ज़मीं पर
मगर शख्सियत हर किसी की बेमुल्क होती है
हर कोई सिर्फ़ अपने बारे में सोच रहा है

सबकी खुशियाँ भी अब गमगीन होती है
सचाई से हटकर ज़िंदगी जब संगीन होती है
भरोसा तो अपने वजूद का भी नहीं होता
फिर दूसरों से उम्मीदें नामुमुकिन होती है
क्यों इंसान बेहोशी की नींद सो रहा है

यूँ न होगी जंग पूरी दहशत की खिलाफत में
जब जुड़ेंगे सभी एक दूसरे की आफत में
तभी होगी एक सुबह रोशनी सी
जियेंगे सभी फिर इंसानियत और शराफ़त
यही एक मसला है जो हम सबको जोड़ रहा है


राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'

Wednesday, March 27, 2013

आबो-हवा



इस शहर का माहौल भी बडा अजीब है
हर कोई है दूर खुद से मगर मायूसी के बड़ा करीब है

बीमार अहसास है सबके घरों में
ज़िन्दगी हर किसी की सुस्त पड़ी है
छोटी सी लगती है ये दुनिया मगर
इसकी परेशानियाँ बहुत बड़ी है
हर किसी का यहाँ पर अलग-अलग नसीब है

जली जा रही हैं साँसें सबकी
ज़िन्दगी से मगर कोई दोस्ती नहीं है
होश में रहकर भी जागते नहीं हम
ये कैसी शख्सियत है जो बोलती नहीं है
कि सोच से हम अपनी कितने गरीब हैं

रहगुज़र की तलाश में भटकते रहें हैं
पर सुकून को कोई भी ढूंढता नहीं 
सभी पड़े हैं अपनी ही धुन में
और कोई भी किसी से जुड़ता नहीं
हर कोई दूसरे को मानता रकीब है

लहजा तो अपना बदल भी दिया
पर शिकायत को अपनी बदला नहीं
घूमते  रहे हो आबो-हवा में
पर ग़ुलामी से कोई भी निकला नहीं
बस सपनों के सफ़र में दर्द की भीड़ है

इस शहर का माहौल भी बडा अजीब है
हर कोई है दूर खुद से मगर मायूसी के बड़ा करीब है


राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'

मेरी सुबह को लोग रतिया समझते हैं ....

मेरी सुबह को लोग रतिया समझते हैं  पेड़ की शाखो को वो बगिया समझते हैं  कद्र कोई करता नहीं गजलों की यारों  सब खिल्ली उड़ाने का जरिया समझते हैं...