Tuesday, July 16, 2013

भ्रष्टाचार =कॉंग्रेस भाग-1


क्या हो रहा है यहाँ पर सभी बेख़बर हैं
ज़िंदगी भी हो रही किसी तरह बसर है

एक दूसरे पर खींचते हो दो धारी तलवारें सब तुम
आदर और सम्मान लेकिन रहता अब काग़ज़ पर है

छींटाकंशी की आदत भी बड़ी ही निराली है
दूसरों पर हो तो ठीक है , पर खुद पे हो तो ग़लत है

नशे से भरे शहर हैं , धुएँ के उड़ते लबादे
नौजवानो ने इस तरह उड़ा दी अपनी फिकर है

आदमी तो क्या है ये तो घरों की सड़ती कहानी
क्या करें जो व्यवस्था हो रही इतनी लचर है

भ्रष्ट है ये आचरण हमे इतना ज्ञात है
पर हमेशा से वही खोखला मजबूर डर है

त्रासदी तो हो चुकी है देवभूमि के घरों मे
चीखता है मौन रूदन , सूखते आँसू नज़र है

वाह मेरे प्रशासन की महिमा , टुकड़े कुछ पकड़ा गये
राजनीति है ज़रूरी , फिर वो चाहे लाशों पर हैं

मसले ये नहीं कि भ्रष्ट व्यवस्था , महंगाई  की मार है
बस धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता का मुद्दा ही प्रबल है

हे मेरे मंत्री बहुगुणा , गुण बहुत है तुम पे माना
ये तुम्हारी चालक लोमड सोच अब तो शीर्ष पर है

थक गये हैं , पक गये हैं , नागरिक भी तुमसे(कॉंग्रेस) अब तो
एक नया संग्राम तुमको हराने को तत्पर है


राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'


Saturday, July 6, 2013

लकीरें



कैसे हुए ये दिन कि गुज़रते नहीं
लम्बी दूरी हो गई मगर फिर भी चलते नहीं

ग़ज़ब है कि बहुत सारी हिदायतें है जीने में
और लोग हैं कि बात को समझते नहीं

दरकिनार किया कई सारी बेसमझ अटकलों को
मगर यूँ ही लबों से भी लफ्ज़ तो फिसलते नहीं

भीगी हुई मिटटी में कुछ गीली हुई है लकड़ियाँ
इसीलिए तो इनके गट्ठर सुलगते नहीं

अब कोई रिश्ता नहीं है अतीत के मुहाने से
तभी हम उन यादों को पास रखते नहीं

बिना सोचे समझे निकाला गुस्से का ग़ुबार
क्यों हम बिफरने से पहले परखते नहीं

आदतों का तो ईमान है कि सटकर रहेंगी हमसे
नाता सच्चाई से फिर क्यों रखते नहीं

बहुत शोर -शराबा किया जब अपने हक पर बात आई
पर दूसरों के लिए कभी हम लड़ते नहीं

बूंदों में भरकर भी सूखे हो चले हैं नैन
सही मौकों पर कभी-कभी ये बरसते नहीं

लेकिन ये कैसा है जो ज़िन्दगी से चिपका है
मजबूरियों से कभी हम बचते नहीं

ढेर लगा है बहुत सारे कीमती सामानों का घर में
फिर भी ये दिलो-दिमाग खुश लगते नहीं

किस्मत पर रोओगे और कहोगे यही लिखा था
क्यों अपनी लकीरों को फिर बदलते नहीं


राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'

आगाज़


अभी गुज़रने से कोई मंजिल पास आएगी
अपनी हकीकत की दास्ताँ सबको आज सुनाएगी

चलने का सिलसिला लगातार बनाए रखा था
तभी जल्द ही सारी मुश्किलें छंट जाएंगी

बेहोश मन का एक सिरा कई ख्याल बुनता है
और कुछ उल्टा-सीधा हुआ तो सांस पर बात आएगी

कंठ से निकले सुर भी मिश्री घोल रहे हैं
पाँव से निकली धुल भी कितनी राहें सजाएंगी

आक्रोश तो होगा ही जब हर कदम पर ठोकर लगी
मगर मुश्किलों के बाद ही तो मुस्कराहट आएगी

पेंच बहुत हैं कि खबरदार नहीं होता हूँ जिस्म से
मगर सच्ची जीत की खुशबू तो रूह से आएगी

कौन बिगड़े हुए ज़माने से मुंहजोरी करता है
अपनी किस्मत सही हुई तो इनको नानी याद आएगी

कर्मप्रधान है जीवन इसमें कोई शक नहीं
भाग्य भरोसे रहने वालों की तो लुटिया डूब जाएगी

आगाज़ तो कर चुका हूँ कामयाबी के सफ़र की
सच्चाई और हिम्मत मुझे मंजिल तक पहुंचाएगी


राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'


Thursday, July 4, 2013

कशमकश


 
वक़्त की सुरंग से जाने कितने लम्हे निकले
कुछ आगे चले गये कुछ रह गये पीछे

सुकून भी बेहिसाब सदमों की गिरफ़्त मे है
अश्कों ने अब चेहरों पर समंदर है खींचे

दो पल के लिए कोई हाथ पर उम्मीदें बांधता है
मगर मुश्क़िलों की भीड़ मे सब रह गये पीछे

एक कोहरे से सर्द मौसम की आस लगी थी
मगर उसने भी धुएँ से अपने लिबास हैं खरीदे

दिन का चेहरा मायूस है रात की बेरूख़ी हवाओं से
क्योंकि शबनम की आग से जल गये है बगीचे

नज़्म है बेसुरी मगर फिर भी साज़ छेड़ता हूँ
क्या पता टूटे सुर से कोई नायाब राग निकले

आबो हवा भी अब गमगीन हो गयी है
आख़िर पत्तियों ने जो बदले हैं बहने के तरीके

बेमन से शिरकत की दोस्तों की महफ़िल मे
ऊपर खाली आसमान है बंजर धरती है नीचे

हालात से लड़ने की मेरी हमेशा क़वायद रही है
इरादों ने जो आज़माए हैं संभलने के सलीके

कशमकश है की क्या करूँ ज़िंदगी से खफा नहीं हो सकता
बहुत से ऐसे पल हैं ज़िंदगी मे जो बेवजह हैं बीते


राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'

Wednesday, July 3, 2013

चीथड़े.......


जलते चराग़ भी देखे कि बुझ गए
चलते -चलते ना जाने कदम क्यों रुक गए

कई राजा रंक बने और कई रंक राजा
इस वक़्त की मेहरबानी से सब बदल गए

रसूख वाली शख्सियत भी धूल हो गयी
चमचमाते महल भी राख मे ढल गए

पसीने की हर एक बूँद का हिसाब लगेगा
और खून के सभी छींटो से जिस्म सिहर गए

कलह की स्रोतवाहिनी दिमाग़ की उपज है
मगर प्रेम भाव बस चेहरों तक सिमट गए

काँपते हाथों से सहारा दिया ग़रीब को
और अमीर के सामने झुक कर लिपट गए

क्या हुआ कि मानसिकता भी निम्न स्तर की हो चली है
मानवता के मानक भी कालाबाज़ारी मे गिर गए

लाख कोशिश की ज़मीर को संभालने की
मगर खनखनाते सिक्कों के आगे इसके उसूल भी बिक गए

अब चीथड़ो मे गूँथी हुई है जीवन की कहानी
पढ़ने से पहले ही ज़िंदगी के पन्ने फट गए 


राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब' 

Saturday, June 29, 2013

यूँ भी तो कभी.........


यूँ भी तो कभी रंग उड़ जाएँ ये सोचता हूँ
अपने पलटते ख्वाबों को यूँ ही मोड़ता हूँ

चहलकदमी भरी है गलियों के बरामदे मे
और खिड़कियों को भी करीने से खोलता हूँ

मेरी लिखावट से एक दरिया चेहरों पर बह गया
इसीलिए अपनी बेरहम कलम को तोड़ता हूँ

इन यादों की मियाद कब तक रहेगी नहीं जानता
फिर भी दिन ब दिन इन्ही के बारे मे सोचता हूँ

अभी अभी ताज़ा ज़ख़्म है कहीं सूख ना जाए
इसे ज़िदा रखने के लिए रोज़ ही खरोचता हूँ

बिना स्याही से लिखी है इस तरह अपनी दास्तान
कि काग़ज़ के टुकड़ों को भी पढ़ने के लिए जोड़ता हूँ

बह रहे हैं तो बहने दो आख़िर इनका मौसम जो है
मैं आजकल नज़रों से बहता सैलाब नहीं पोंछता हूँ

मेरे लिए ज़िंदगी ने कई रास्तों पर सुराख किए हैं
फिर भी मैं कभी अपनी हिम्मत नहीं छोड़ता हूँ

कितनी दीवारों के दरम्यान कई शीशों की दरार हैं
उन्ही मे मैं अपना चेहरा देखकर बोलता हूँ

लगे हाथ कुछ कामयाबी मिली है तो सिर पर चढ़ ना जाए
इसी डर से कभी कभी अपना सिर भी फोड़ता हूँ

यूँ ना रात की आवारगी जीने देगी मुझे अब कहीं
इसीलिए दिन मे ही सोने के लिए चादर ओढ़ता हूँ


राजेश बलूनी'प्रतिबिम्ब'

Thursday, June 20, 2013

हे हिमालय ........


हे हिमालय इस धरा तुम सा प्रहरी कौन है
तुम हो स्थिर देख सब कुछ हम समझते मौन हैं
आज ये परिदृश्य है कि तुम यूँ क्रोधित हो गए
नीर नयनों से बहाकर हमको विचलित कर गए
मूढ़ता है कि मानव तुम सरीखा बन रहा
थोथली विकासधारा को ये तुम पर थोपता

आओ मानव तुम निस्संदेह हो बड़े महान लेकिन
गर रहोगे तुम अनैतिक , लुप्त होंगे सबके चिन्ह
तुमको फुर्सत मिल नहीं रही राजसत्ता के भंवर में
भूल कर दायित्व अपने चल पड़े अपने सफ़र में
धारा अवगत है तुम्हरी नीचता प्रमाण से
देखो अब तुम रो रहे हो अपनों के अवसान से

तुम अगर जो अपनी आकांक्षा की परिधि तोड़ते ना
यूँ ना अपने सिर को गंगा के तटों पर फोड़ते ना
ये तो ईश्वर जानता है संसृति की दुःख  राग बेला
आज देखो साथ में सब , कल रहेगा हर अकेला
आ गया है अब समय भी रोक कर अपनी ये हठ तुम
यूँ न पूरे वन भूषण को मत करो अम्बर में गुम

वाह! मेरी सरकार देखो क्या परीक्षण करके आई
गोल चक्कर पृथ्वी का देख ऊपर लौट आयी
कह रहे हैं चिन्तितों से हम तुम्हारे साथ है
दो घडी घडियाली आंसू रोने में भी कोई बात है
मेरे पी एम कह रहे मैं कुछ करोड़ों दे रहा
बदले में बस अपने हिस्से कुछ मतों (वोटों) को ले रहा

हे मेरे दलगत सिपाही तुम क्यों इसमें चुप रहे
इस तरह यूँ मुद्दों को आसानी से नहीं छोड़ते
मेरा तुमसे है निवेदन इसमें जितनी हो क्षति
तुम मगर इस त्रासदी में ढूंढ लेना राजनीति
फिर तुम्हारे मत तो क्या तुम सत्ता के काबिल बनोगे
फर्क होगा क्या अगर जो नीति को बोझिल करोगे

जब नए प्रचंड बहुमत में नयी सरकार आई
फेहरिस्त है वादों की जो घर के कोने छोड़ आई
है मलिन यमुना तो क्या है ,जेब तो निर्मल है भाई
क्या हुआ जो गंगा के तट बाढ आई ,बाढ़ आई
शोर क्यों है कर रहे सब, पांच सालों का सफ़र है
अभी तो  कुछ माह बीते, क्यों नहीं सब को सब्र है
इनको सब आराम दो कि इनको दुनिया की फ़िक्र है

क्या कहें अब आधुनिकता के इस नए संसार में
स्वार्थपरता बढ रही है ,मानवता है हार में
द्वेष तो जैसे कि हर एक आदमी से जुड़ गया
आज हर एक प्राणी देखो कर्तव्यों से मुड़ गया
क्या है धोखा ,क्या है दंगल सब समझ में आ गया
चक्रव्यूह है ज़िन्दगी का सबको ये उलझा गया

आ गया अब समय जब क्रोध हो अन्याय से
जीने की अब शर्त है कि जीना है अब न्याय से
छोड़कर दुश्मार्ग झूठा, सत्य का स्वागत करो
कायरों सी जीव लीला अब नहीं, हिम्मत भरो
यहीं पर फिर भारतीयता का एक नया निर्माण होगा
देखो फिर तुम धर्म में जब हर किसी का ध्यान होगा
तभी तो हर एक ह्रदय में प्रेम वर्षित ज्ञान होगा


राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब '




 




मेरी सुबह को लोग रतिया समझते हैं ....

मेरी सुबह को लोग रतिया समझते हैं  पेड़ की शाखो को वो बगिया समझते हैं  कद्र कोई करता नहीं गजलों की यारों  सब खिल्ली उड़ाने का जरिया समझते हैं...