Friday, January 30, 2015

दर्द भी..........

दर्द भी गुज़रती रात का सिला देता है
तमाम उम्र गुज़ारने की वजह देता है

बेरुखी को हाथों से मल रहा है मौसम
मुझे वो अंधेरे से  मिला देता है

हर लम्हा खर्च हो रहा है आजकल
शाम का मुकद्दर मुझे जला देता है   

बड़े खूब थे मेरे यार हंसते थे मुझपे
उनकी यादों का जमघट मुझे रुला देता है

बिसरी बात को करूं याद तो भर आती हैं
 वक़्त पलकों से कुछ बूंदें गिरा देता है

होश मे हूँ मगर एक लम्बी बेहोशी है
जज़्बातों का सूनापन मुझे बता देता है

नशे मे तो दुनिया है मैं कहाँ हूँ
जाम भी छलक कर मुझे दगा देता है

यूं पुरानी ख़राशें हैं मेरे दरम्यान
जीने का सलीका भी सज़ा देता है

इस शहर की बेरुखी भी तब समझ आई
हर शख्स जब सामने से नज़रें फिरा लेता है  

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब' 



Thursday, January 29, 2015

जन्म का ये दिवस भी.....

 
जन्म का ये दिवस भी ,
स्मरण रहेगा मुझे भी 

संवाद स्थापित नहीं हुआ 
जो धन है अर्जित वही हुआ 
ये शृंखला है त्रास की 
बूंदें लगी मधुमास सी 
है सहस्र साथी साथ के
पर कहीं एकांत की छाया मे 

जन्म का ये दिवस भी 
स्मरण रहेगा मुझे भी 

आकांक्षाएं शोषित हुई 
प्रतिकार को प्रेरित हुई 
वनवास फिर श्री राम गये 
रावण सी सृष्टि दिख रही  
भगत जी शिवधाम गये 
बस उसी अर्ध स्वप्न की बेला मे 

जन्म का ये दिवस भी 
स्मरण रहेगा मुझे भी 

ये रश्मियां असंख्य है 
पर सूर्य कब तक दिव्य है 
ये सदियों का संताप है 
ध्वनि तेज़ करना पाप है 
प्रबुद्ध सब चुपचाप हैं 
ये राक्षसी पदचाप है 
मैं स्वयंभू नहीं भिन्‍न इससे 
कर रहा हूँ आत्म मंथन
किसी बीहड़ पथ के तीरे 

जन्म का ये दिवस भी 
स्मरण रहेगा मुझे भी 

नीरस है रहती हर दिशा
मैं स्वप्न दृष्टा कब रहा 
जो स्नेह स्वाति जल रही 
उनका ना मुझमे कुछ रहा 
क्या शेष जीवन रह गया 
अब शीत-श्वासें थक रही 
जब ग्रीष्म क्रोधित मन हुआ   
मन के तिमिर मे खोजकर  
कुछ नव-विधा प्रकाश मैने 
अब जा रहा हूँ रिक्त सा
इस वर्षफल को छोडकर

जन्म का ये दिवस भी 
स्मरण रहेगा मुझे भी 

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'   

Thursday, November 20, 2014

आईना


निकल गए हैं ठोकरें खाकर,कोई ठिकाना चाहिए
दो पल बिता लूँ कुछ पहर,एक आशियाना चाहिए

यूँ सांस का चलना भी दूभर हो गया है
ज़िन्दगी जीने का अब कोई बहाना चाहिए

मेरे रुख में किसी तरह की परेशानी आये ना आये
मगर इस चर्चा में लोगों को आना चाहिए

कई मसले हैं जो बड़े पेचीदा हो रहे हैं
उनसे निपटने को कोई सयाना चाहिए

यूँ ही बदस्तूर जारी रहेगा मुश्किलों से सामना
उनसे लड़ने का जज़्बा साथ आना चाहिए

बड़े शहर में लोगों के दिल बहुत छोटे हैं
उन्हें अपनी अक्ल का दायरा बढ़ाना चाहिए


बुझे मन से हर कोई रिश्ते निभाता है यहाँ
सभी को दिल से रिश्ता निभाना चाहिए


कहाँ ढूँढूँ कि घर में अब नमक का बर्तन नहीं है
मेरे अश्कों से दो चार बूंदों का किराना चाहिए

यूँ बड़ी मीठी बोली बोलते हो ज़ुबान से
दिल के अंदर भी मिश्री को मिलाना चाहिए

मैं देखता हूँ अच्छा, बुरा हर किसी में झाँककर
मुझे भी अपने लिए एक आईना चाहिए

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'   

Wednesday, October 15, 2014

कश्मीर का दर्द


यूँ भी दरकती हुई एक दीवार रह गई
घर की खिड़की में अब दरार रह गई

कुछ कांच के टुकड़े और पत्थरों का बुरादा
इकठ्ठा होकर रेतों का संसार बन गई

बिखरती हुई ज़िन्दगी और चीखती हुई आवाज़
कुछ कुछ मिलाकर गुमनाम पुकार बन गई

तबाही का एक सैलाब ले उड़ा पूरे शहर को
बचा कुछ नहीं बस शिव की चौपाल रह गई

तुझसे कौन लड़ सकता है कुदरत; हमें  नहीं पता
पर नाकाम तो यहाँ की राज्य सरकार रह गई

बेशर्म है स्थानीय प्रशासन जो खोखले दावे करता है
पर केंद्र का त्वरित मरहम जीवन का द्वार बन गई

मारते थे जिनको पत्थर अपना रकीब मानकर
वो भारत की वीर सेना आज तारणहार बन गई

कहाँ है वो देशद्रोही यासीन मालिक और गिलानी
चूड़ियाँ पहनकर बैठें हैं और घाटी यहाँ बरबाद रह गई

झेलते हैं आपदा को क्यों मगर दहशत को झेलें
क्यों अब कश्मीर की धरती बग़दाद बन गई

अमृत का पान पीने कई सियासत दान आये
घटिया मानसिकता से नदी भी विषधार बन गई

कश्मीर का अस्तित्व भारत के संगठन से फलता है
अलगाववादियों की ज़हरीली सोच फिर लाचार रह गई


राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब' 

Tuesday, September 2, 2014

सिलसिला


राहों का क्या है गुज़रती रहेंगी
सवाल-ओ-ज़हन भी तो रुकता नहीं है

सितारों से छुपकर कहाँ जा रहा है
फलक का ये मौसम चला जा रहा है
तलाशा बहुत है कि मिलता नहीं है

ये खिलती सुबह का नज़ारा तो देखो
यूँ जीवन से नज़रें मिलकर तो देखो
कहीं पर कोई राज़ छुपता नहीं है

दीवारें भरी है दरारों से लेकिन
संभलना वहां पर तो फिर भी है मुमकिन
यूँ ज़र्रों का गिरना भी चुभता नहीं है

ये दुनिया तो कितने सवालों भरी है
मेरे सामने कितनी मुश्किल पड़ी है
ये क्या सिलसिला है कि रुकता नहीं है

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'
  

अच्छी बात आएगी...........



कुछ सांसों की मरम्मत भी काम आएगी
कुछ इसी तरह से ज़िन्दगी की शाम आएगी

फूला हुआ मुंह लेकर बड़े दूर खड़े हो
मुझसे लड़ने की बेचैनी तुम्हे मेरे पास लाएगी

कई यादें यूँ ही बरामदे पड़ी सो रही हैं
उनकी फितरत भी थोड़ी देर में जाग जाएगी

ज़ोर है बहुत कि कुछ सूखे हुए जज़्बात है
इंतज़ार करो कुछ पल कि अभी बरसात आएगी

दिल यूँ उचट रहा है कि सस्ती ज़िन्दगी नब्ज़
मरने पर ही बाज़ार में सही दाम पाएगी

बहुत सारी भाग दौड़ और आपा धापी के बाद कहीं
ये थकी रूह भी बड़ा आराम पाएगी

ख़यालात आजकल बासी है और अभी यहाँ धोखा है
फिर भी कभी किसी मोड़ पर अच्छी बात आएगी

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब' 

Thursday, March 20, 2014

शुरुआत



शुक्र है कि कहीं कुछ बात तो हुई
थोड़ी सी सही मगर शुरुआत तो हुई

लफ्ज़  भी सिकुड़ रहें थे जुबां पर आने से
कोई गुफ़तगू अब कहीं आज़ाद तो हुई

सूखे हुए दरख़्त और वीराने से इस शहर में
खिलते हुए फूलों कि बरसात तो हुई

सुबह का सर्द कोहरा और दिन कि झुलसती आंच
शाम से होते हुए फिर कहीं रात तो हुई

चोट भी खुरचते हुए दर्द में लिपटी थी
मुझे जो परेशां करे वो हसरत बरबाद तो हुई

रोज़मर्रा उसी ढर्रे पर ज़िन्दगी चलताऊ थी
अब जाकर नई दुनिया की सौगात तो हुई

पंख फैलाकर आस्मां को नापना आसान है
दूर चमके तारों से अब ज़रा बात तो हुई

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब' 

मेरी सुबह को लोग रतिया समझते हैं ....

मेरी सुबह को लोग रतिया समझते हैं  पेड़ की शाखो को वो बगिया समझते हैं  कद्र कोई करता नहीं गजलों की यारों  सब खिल्ली उड़ाने का जरिया समझते हैं...