Saturday, August 27, 2016

खराशें

मत गुज़र उन रास्तों से जहाँ सब होते हैं
यहाँ हर जगह,हर कदम पर बड़े धोखें हैं

बेसमझ इरादों का नतीजा कुछ ऐसा था
कि अधूरी ख्वाहिशों पर अब सर पटक रोते हैं

वज़न तो उम्मीदों का इस कदर भारी हुआ
कि क़र्ज़ अब ग़मों का यूँ ही ढोते हैं

खाली मकान, टूटा बरामदा, सूखी घासें यही सब बचा हैं
आँगन में अब टूटे शीशों के झरोखें हैं

बात आयी सामने तो हुआ एहसास ये भी
मिलता वही है जो हम जिंदगी में बोते हैं

दर्द का आना जाना तो लगा रहता है अमूमन
पर हंसी के मायने भी आजकल अजीब होते हैं

यूँ खराशें तो ज़ख़्म पर सिमटती ही रहती है मगर
अश्क़ भी नमक बनकर उसको भिगोते हैं

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'
     

Saturday, July 16, 2016

रात बेशहर है


तकल्लुफ नहीं है ज़हन मे कि बाकी उमर है
बाद मे गौर करेंगे कि  कौन सा सफ़र है

उजली धूप यहाँ पर काली हो गयी
सूरज के अंदर भी अँधेरे का घर है

तमाम हथकंडे अपनाए तन्हाई के
आसपास मगर शोरगुल के मंज़र है

उम्मीद लंगड़ी हो गयी कि  पैर तिठकने लगे
मौत तो आती नहीं और ज़िंदगी बेअसर है

निशान भी देखे कि सब मिट गये हैं
बस रेत के बड़े बड़े रेगिस्तान नज़र है

बिना मंज़िल के क़दमों को बढ़ाए जा रहे हैं
पता नहीं कौन सा बेनाम ये सफर है

दर्द के टुकड़ों पर मुस्कराहट की परत नहीं होती
नैनों में बसता अब अश्कों का शहर है

सुबह की हवाएँ कभी मायूस हो जाती है
अपने ठिकाने पर नहीं रात अब बेशहर है

                      -राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'


Monday, May 9, 2016

समंदर-ए-अश्क़......

दर्द का पता नहीं, जिस्म ये छिल रहा है
मौत की आगोश में दिन भी ढल रहा है

दरीचों से गीली मिटटी हाथ में उठाई
ज़र्रा ज़र्रा हाथ से फिसल रहा है

बात बेबात यहाँ नूराकुश्ती होती है
सुकून भी अपने ठिकाने बदल रहा है

रोज़मर्रा वही हक़ीक़त है जो दिख रही है
सपनों का बगीचा तो सड़ गल रहा है

दोराहे पर खड़े हैं और मंज़िल आ पता नहीं
वक़्त अपनी चाल को धीमा चल रहा है

सुरीली तान तुमने छेड़ी तो थोड़ा सुकून आया
पर दर्द के नग्मों में समंदर-ए-अश्क़ पल रहा है

बेचैन राहें, बेबस इरादे,यही बस अपनी कहानी है
जाने किस ओर अपना रुख बदल रहा है

कीमत भी जज़्बातों की इतनी सस्ती है
की खोटा ही सही अपना भी सिक्का चल रहा है
 
राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब' 

Wednesday, February 25, 2015

कच्ची सड़क , भीगा दरीचा.......

कच्ची सड़क , भीगा दरीचा और ज़िंदगी बीत गई  
बेसांस उनींदी याद से आज  कहानी जीत गई

जुस्तजू गमगीन हैं और सदायें चुप ज़रा
गुज़र बसर करते हुए ;ये जवानी बीत गई

सुस्त मौसम सो गया , हवा कुछ नाराज़ सी
इन फिज़ाओं के नशे मे ज़िंदगानी घिर गयी

सरगुज़श्त हो रहे है हर नये से फैसले
फासलों के दरमियां ये ज़ुबानी  बिक गयी

अब नहीं होती है मेरे घर मे कोई खिड़कियां
यूं अंधेरे की चिता मे रोशनी भी बुझ गई

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब' 

Friday, January 30, 2015

दर्द भी..........

दर्द भी गुज़रती रात का सिला देता है
तमाम उम्र गुज़ारने की वजह देता है

बेरुखी को हाथों से मल रहा है मौसम
मुझे वो अंधेरे से  मिला देता है

हर लम्हा खर्च हो रहा है आजकल
शाम का मुकद्दर मुझे जला देता है   

बड़े खूब थे मेरे यार हंसते थे मुझपे
उनकी यादों का जमघट मुझे रुला देता है

बिसरी बात को करूं याद तो भर आती हैं
 वक़्त पलकों से कुछ बूंदें गिरा देता है

होश मे हूँ मगर एक लम्बी बेहोशी है
जज़्बातों का सूनापन मुझे बता देता है

नशे मे तो दुनिया है मैं कहाँ हूँ
जाम भी छलक कर मुझे दगा देता है

यूं पुरानी ख़राशें हैं मेरे दरम्यान
जीने का सलीका भी सज़ा देता है

इस शहर की बेरुखी भी तब समझ आई
हर शख्स जब सामने से नज़रें फिरा लेता है  

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब' 



Thursday, January 29, 2015

जन्म का ये दिवस भी.....

 
जन्म का ये दिवस भी ,
स्मरण रहेगा मुझे भी 

संवाद स्थापित नहीं हुआ 
जो धन है अर्जित वही हुआ 
ये शृंखला है त्रास की 
बूंदें लगी मधुमास सी 
है सहस्र साथी साथ के
पर कहीं एकांत की छाया मे 

जन्म का ये दिवस भी 
स्मरण रहेगा मुझे भी 

आकांक्षाएं शोषित हुई 
प्रतिकार को प्रेरित हुई 
वनवास फिर श्री राम गये 
रावण सी सृष्टि दिख रही  
भगत जी शिवधाम गये 
बस उसी अर्ध स्वप्न की बेला मे 

जन्म का ये दिवस भी 
स्मरण रहेगा मुझे भी 

ये रश्मियां असंख्य है 
पर सूर्य कब तक दिव्य है 
ये सदियों का संताप है 
ध्वनि तेज़ करना पाप है 
प्रबुद्ध सब चुपचाप हैं 
ये राक्षसी पदचाप है 
मैं स्वयंभू नहीं भिन्‍न इससे 
कर रहा हूँ आत्म मंथन
किसी बीहड़ पथ के तीरे 

जन्म का ये दिवस भी 
स्मरण रहेगा मुझे भी 

नीरस है रहती हर दिशा
मैं स्वप्न दृष्टा कब रहा 
जो स्नेह स्वाति जल रही 
उनका ना मुझमे कुछ रहा 
क्या शेष जीवन रह गया 
अब शीत-श्वासें थक रही 
जब ग्रीष्म क्रोधित मन हुआ   
मन के तिमिर मे खोजकर  
कुछ नव-विधा प्रकाश मैने 
अब जा रहा हूँ रिक्त सा
इस वर्षफल को छोडकर

जन्म का ये दिवस भी 
स्मरण रहेगा मुझे भी 

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'   

Thursday, November 20, 2014

आईना


निकल गए हैं ठोकरें खाकर,कोई ठिकाना चाहिए
दो पल बिता लूँ कुछ पहर,एक आशियाना चाहिए

यूँ सांस का चलना भी दूभर हो गया है
ज़िन्दगी जीने का अब कोई बहाना चाहिए

मेरे रुख में किसी तरह की परेशानी आये ना आये
मगर इस चर्चा में लोगों को आना चाहिए

कई मसले हैं जो बड़े पेचीदा हो रहे हैं
उनसे निपटने को कोई सयाना चाहिए

यूँ ही बदस्तूर जारी रहेगा मुश्किलों से सामना
उनसे लड़ने का जज़्बा साथ आना चाहिए

बड़े शहर में लोगों के दिल बहुत छोटे हैं
उन्हें अपनी अक्ल का दायरा बढ़ाना चाहिए


बुझे मन से हर कोई रिश्ते निभाता है यहाँ
सभी को दिल से रिश्ता निभाना चाहिए


कहाँ ढूँढूँ कि घर में अब नमक का बर्तन नहीं है
मेरे अश्कों से दो चार बूंदों का किराना चाहिए

यूँ बड़ी मीठी बोली बोलते हो ज़ुबान से
दिल के अंदर भी मिश्री को मिलाना चाहिए

मैं देखता हूँ अच्छा, बुरा हर किसी में झाँककर
मुझे भी अपने लिए एक आईना चाहिए

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'   

मेरी सुबह को लोग रतिया समझते हैं ....

मेरी सुबह को लोग रतिया समझते हैं  पेड़ की शाखो को वो बगिया समझते हैं  कद्र कोई करता नहीं गजलों की यारों  सब खिल्ली उड़ाने का जरिया समझते हैं...