Friday, October 6, 2017

ज़हन





खुश कम रहें तो भी कलह नहीं होती
यूँ बेबात झगड़ने की कोई वजह नहीं होती

मेरी शाम कुछ बिखरते हुए पन्नों में सिमट गयी है
रात होने को है पर कहीं सुबह नहीं होती

बहुत कोशिशें की थी हालत से दर-ब-दर
बड़ी मुद्दत्तों  के बाद भी कोई  सुलह नहीं होती

छूटते हैं रिश्ते कई मतलबी मंसूबों के लिए
थाम सकूं उनको ऐसी गिरह नहीं होती

खानाबदोश हुआ साया जो वैसे ही गुमनाम था
उस से मेरी वजूद की कोई जिरह नहीं होती

हवा भी दोष देती हैं साँसों को इस तरह
की धड़कनो में जीने की वजह नहीं होती

सूखे हैं जज़्बात सब पानी हो चला है
आदमी की परछाई की कोई सतह नहीं होती

पीठ पर खंजर से वार करने वालों के लिए
दिल के किसी कोने में जगह नहीं होती

वो रोज़ मेरे लोगों के लिए परेशानी का सबब बनता है
दोस्तों की पहल कभी इस तरह नहीं होती

मेरे ज़हन में कई सवाल कौंध रहे हैं बेसबब
यूँ हालत से हारी हुई बाज़ी बेवजह नहीं होती


राजेश बलूनी ' प्रतिबिम्ब' 

Monday, July 10, 2017

कोई गीत नहीं बचा है......

यूँ ज़िन्दगी से कुछ सीख नहीं सका
कि टूटते रिश्तों की डोर खींच नहीं सका

ऐसा नहीं कि ज़िन्दगी का साज़ बेसुरा
बस मेरे पिटारे में कोई गीत नहीं बचा

कई नग़मे लिख चुका हूँ क़दमों की ताल पर  
अब थिरकते पांवो के लिए संगीत नहीं बचा है

राहगीर आता है घर में लौटकर तो देखता  है
घर में इंतज़ार को मनमीत नहीं बचा 

बाज़ियां बहुत खेली मैंने और एक सिरे तक पहुंचा भी
बहुत मशक्कत के बाद भी मैं जीत नहीं सका

कुछ अंकुरित फुलवारी रही थी कभी यहाँ
मगर अब सहरा में कोई बीज नहीं उगा

परेशां मैं हूँ कोई बात नहीं है मेरे यार
पर मेरे लिए तेरा उदास होना ठीक नहीं लगा

तूफ़ान भी आया बवंडर भी आया
इतना बड़ा समंदर भी आया,पर दीप नहीं बुझा

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'


Sunday, January 29, 2017

जन्मदिवस आया, नयी थाह लाया


जन्मदिवस आया, नयी थाह लाया
अर्ध संकल्पित जीवन में पूर्णता की चाह लाया

विदित हो कि जीवन का प्रतिक्षण अनुपम है
यही तो सुखानुभूति और दुखों का संगम है
परिचित भी जब दूर जाये और अज्ञात छवि
जब पास आए, अनुभव की इस  सृष्टि में
ईश्वर ने क्या खेल दिखाए !
मन मस्तिष्क हुआ प्रसन्न जब अंधियारे में कोई साथ आया
जन्मदिवस आया, नयी थाह लाया.......

अवरुद्ध मार्ग है, असंख्य विलाप हैं
नाना प्रकार के क्रियाकलाप हैं
शीतलता का मर्म साथ में ,क्रोध का उन्मत्त उच्चताप लाया
शमन चित्त, नयन स्थिर,वेनियों ने झंकृत राग गाया
जन्मदिवस आया, नयी थाह लाया.......

दिव्य ज्योति से प्रबुद्ध ज्ञान, सम्पूर्ण विश्व का सम्मान,
विकृत विचारों का परित्याग, रात्रिकोश से उद्घृत विहान
विमर्श-विनिमय की स्वतंत्रता का भान, शांति स्थापित करे फिर प्राण,
पर उग्रता का भी है स्थान,
हृदय-मस्तिष्क के मंथन में स्मृति-अमृत पास आया
जन्मदिवस आया, नयी थाह लाया.......

अंतिम श्वास का यही है बोध
जीवन में हर स्मृति का कोष
कुछ मधुर संगीत का लोकमंचन,
कुछ असीमित कटु सत्य का प्रतिरोध
इन्ही विमर्श-बूटियों से नया जीवन-विचार आया
 जन्मदिवस आया, नयी थाह लाया.......

राजेश बलूनी 'प्रतिबम्ब'

 

 

Tuesday, January 24, 2017

नकली ज़िंदगी


दुनिया मे चकाचौंध अजब नहीं है 
मुख़ौटे ओढना यहाँ ग़लत नहीं है    
तुझे भी पसंद नहीं सादगी तो छोड़ो 
तू भी दुनिया से कुछ अलग नहीं है 
वो नकली ज़िंदगी का हवाला देते हैं 
पर मेरी सच्चाई का मुझमे बस नहीं है 
क्या शानो -शौकत जब ज़मीर ही खोखला है
लगता है तुम्हे ज़िंदगी की परख नहीं है 
मैं तो रहूँगा हमेशा ऐसे ही खालिस
तुझे मैला रहने से फ़ुर्सत नहीं है 
कद्र नहीं होती यहाँ भोलेपन की देख लो
चालबाज़ी कर लूँ  ऐसी शख्सियत नहीं है

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'  

Sunday, December 11, 2016

हकीकत के नाम




सपनो से अलग, हकीकत के नाम
पीढ़ियों दर पीढ़ी गुज़रती ये शाम

महफ़िलों से लुटती वाह वाही भी देखी
देखा है टूटता और छलकता जाम

झूठ के मुखौटों से चेहरा छुपाकर
सच को किया है सबने बदनाम

कौन है जो साथ देने का दम भरता है
मिलेगा कहीं नहीं जब भेजेंगे पैग़ाम

घिसे हुए जूते और झुर्रियों भरा चेहरा
सच्चाई के ठोकरों का यही है इनाम

ज़िन्दगी तो वैसे ही महंगी हो चली है
लाशों का भी आजकल ऊंचा है दाम

रोटी तो होती नहीं गरीब की थाली में
लानतें मिलती है अमीरों से तमाम

शायर हूँ तो लिख रहा हूँ फिक्रमंद होकर
इसी उम्मीद में कि ढलेगी ये शाम

-राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'





Thursday, October 27, 2016

बदस्तूर




टूटे हुए धागे से अब कोई माला नहीं जोड़ता
बिगड़ने से पहले कोई क्यों नहीं सोचता

मैं तो यूँ ही जिया हूँ दोस्तों की खातिर
सर्द रात की फ़िक्र होती तो लिहाफ़ नहीं छोड़ता

बहुत लोग हैं जो अपनी बात से जल्दी मुकर जाते हैं
मेरी फ़ितरत है कि मैं वादा नहीं तोड़ता

सच का इस कदर मैं ग़ुलाम हो चुका हूँ
कि चाहने पर भी झूठ से रिश्ता नहीं जोड़ता

अब बदस्तूर रास्तों  की ख़ाकें छान  रहा हूँ
नहीं तो मैं दीवारों मे अपना सिर नहीं फोड़ता

बड़ा अजब है कि लोग यहाँ कौड़ियों के लिए कत्ल करते हैं
क्या उन्हे उनका ज़मीर नहीं कचोटता

मैं समंदर के किनारे समेट रहा हूँ पलकों मे
अब अश्कों को गिरने से मैं नहीं रोकता

- राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब' 

Saturday, August 27, 2016

खराशें

मत गुज़र उन रास्तों से जहाँ सब होते हैं
यहाँ हर जगह,हर कदम पर बड़े धोखें हैं

बेसमझ इरादों का नतीजा कुछ ऐसा था
कि अधूरी ख्वाहिशों पर अब सर पटक रोते हैं

वज़न तो उम्मीदों का इस कदर भारी हुआ
कि क़र्ज़ अब ग़मों का यूँ ही ढोते हैं

खाली मकान, टूटा बरामदा, सूखी घासें यही सब बचा हैं
आँगन में अब टूटे शीशों के झरोखें हैं

बात आयी सामने तो हुआ एहसास ये भी
मिलता वही है जो हम जिंदगी में बोते हैं

दर्द का आना जाना तो लगा रहता है अमूमन
पर हंसी के मायने भी आजकल अजीब होते हैं

यूँ खराशें तो ज़ख़्म पर सिमटती ही रहती है मगर
अश्क़ भी नमक बनकर उसको भिगोते हैं

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'
     

मेरी सुबह को लोग रतिया समझते हैं ....

मेरी सुबह को लोग रतिया समझते हैं  पेड़ की शाखो को वो बगिया समझते हैं  कद्र कोई करता नहीं गजलों की यारों  सब खिल्ली उड़ाने का जरिया समझते हैं...