Wednesday, March 27, 2013

आबो-हवा



इस शहर का माहौल भी बडा अजीब है
हर कोई है दूर खुद से मगर मायूसी के बड़ा करीब है

बीमार अहसास है सबके घरों में
ज़िन्दगी हर किसी की सुस्त पड़ी है
छोटी सी लगती है ये दुनिया मगर
इसकी परेशानियाँ बहुत बड़ी है
हर किसी का यहाँ पर अलग-अलग नसीब है

जली जा रही हैं साँसें सबकी
ज़िन्दगी से मगर कोई दोस्ती नहीं है
होश में रहकर भी जागते नहीं हम
ये कैसी शख्सियत है जो बोलती नहीं है
कि सोच से हम अपनी कितने गरीब हैं

रहगुज़र की तलाश में भटकते रहें हैं
पर सुकून को कोई भी ढूंढता नहीं 
सभी पड़े हैं अपनी ही धुन में
और कोई भी किसी से जुड़ता नहीं
हर कोई दूसरे को मानता रकीब है

लहजा तो अपना बदल भी दिया
पर शिकायत को अपनी बदला नहीं
घूमते  रहे हो आबो-हवा में
पर ग़ुलामी से कोई भी निकला नहीं
बस सपनों के सफ़र में दर्द की भीड़ है

इस शहर का माहौल भी बडा अजीब है
हर कोई है दूर खुद से मगर मायूसी के बड़ा करीब है


राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'

आवाजाही



चलते जा रहे हैं पहिये ज़िन्दगी के
कौन इन्हें मंजिल तक पहुंचाएगा
ठोकर लगेगी अगर रास्तों में तो
कौन इसको आगे बढ़ाएगा

ये दिन भी खाली  हो जायेंगे आसमां की तरह
मैं सोचता हूँ कब वो वक़्त आएगा

इंसान इतना खुदगर्ज़ भी हो सकता है ये इल्म नहीं था
कि रास्ते पर मिले दोस्तों को भी अजनबी कह जाएगा

रात की काली दिशाओं में सब खो गया है
अब कौन है जो सूरज का माथा सजाएगा

खो चुके हैं ज़िन्दगी के हमदर्द साए
अब किस पर करें उम्मीद जो साथ निभाएगा

अपनी शख्सियत से शिकायत का कोई मसला नहीं है
मगर कोई तनहा साँसों को भी आखिर कब तक चलाएगा

ढूंढ़ रहे हैं धुंधली चांदनी में सर्द रातें हम
फिर गर्मजोशी के माहौल को कौन सजाएगा

ज़हर से भरा एक प्याला रखा है अपनी हथेली में
गर हालात बद्तर हुए तो ये भी काम आएगा

बस इसी तरह वक़्त की आवाजाही लगी रहेगी
फिर लम्हों से ज़िन्दगी को कौन सजाएगा

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'

चलते-रुकते




जज़्बात कुछ इस तरह छलकते हैं
कि हम उन्हें भी पैमानों में परखते हैं

ख़ुशमिज़ाजी का माहौल हमें पसंद नहीं
हम तो दर्द की दुनिया में रहते हैं

गिरते रहते हैं यूँ मोतियों के ढेर
निगाहों से कुछ इस तरह दरिये बहते हैं

खरोचने से भी ज़ख्मों को दर्द नहीं होता
यूँ ही हम बेधड़क ग़मों को सहते हैं

आशियाँ बनाना बड़ी ज़ददोज़हद का काम है
यहाँ तो महल भी ताश की तरह ढहते हैं

कोई देख न ले हमें जिंदा यहाँ पर
हम तो मौत के सहारे छिप कर निकलते हैं

जो चमकते हैं कभी बेख़ौफ़ होकर
वो सितारे भी फ़लक से ज़मीं पर बिखरते हैं

हमें किसी से कोई शिकवा नहीं
हम तो खुद ही को मुजरिम समझते हैं

बेरास्ता हो चुकी हैं अब सारी मंजिलें
कभी उन पर चलते हैं तो कभी उन पर रुकते हैं

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'

Saturday, March 23, 2013

ठीकठाक


कई झांसों में ज़िन्दगी इस तरह उलझी है
मेरी शिकायत मुझसे ही है किसी और से नहीं है

दो बातों की भी फुर्सत नहीं है
गुफ्तगू भी ख़त्म हो गई और चुप्पी रह गई है

मेरे पास तमाशों के बहुत ज़खीरे हैं
जब इल्जामों की फेहरिस्त होगी तब भी हम सही हैं

चंद गिले और पुराना हिसाब किताब बहुत सा
हैं भी या फिर मुझे कोई ग़लतफ़हमी है

आंच दामन पर लगी और मैले हाथ हो गए
पानी से भी धोकर देखा फिर भी गंदगी है

क्या करें ढूंढ़ रहे हैं मोह्ल्लतें जीने कि
जबसे हमने मरने की खबर सुनी है

अरे! मैं तो बड़ा सख्तमिजाज था सबके लिए
अब क्यों गलत होने पर भी मेरी गलती नहीं है

चलो ठीकठाक हो जाएगा एक दिन माहौल भी
अभी बहुत देर है क्यों इतनी जल्दी पड़ी है


राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'




ढकोसला



मुझे आजकल खुद की बड़ी ज़रूरत है
इसीलिए खुद के लिए बहुत ज्यादा फुर्सत है

एक गीत लिखता हूँ खुद के लिए
बाकी लोगों के लिए अभी वक़्त है

मौसम आज का बड़ा जानलेवा है
ठंडी साँसों में भी धुंए का ज़िक्र है

दूसरा कोई सोचे या नहीं सोचे कोई गिला नहीं
मगर मुझे तो अपनी बड़ी फ़िक्र है

मुलायम भी रहा लम्हा मेरे लिए कई बार
मगर अब तो इसके इरादे भी सख्त हैं

मुंह के सामने पड़े थे कई निवाले
मगर खाने में हम बड़े सुस्त हैं

कोई उठा दे उम्मीदों का बोझ बड़ा भारी है
उठाने में मेरी हालत बड़ी पस्त है

न टहनी है न कोई फूल ही खिला है
मेरे दरीचे मे अब सूखा हुआ दरख़्त है

लोगों से खूब लड़ता हूँ जब मेरे साथ गलत हुआ
आखिर मुझमे भी बची हुई थोड़ी  हिम्मत है

मैं बड़ा बेशर्म और खुदगर्ज़ हूँ ये पता है मुझे
मगर कोई दूसरा कहे तो वो मेरे लिए बेगैरत है

बहुत ढकोसला कर लिया कि अपनी बड़ी इज्ज़त है
मगर क्या करूँ मेरी ज़िन्दगी अब बेईज्ज़त है

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'

कुछ नया कुछ पुराना




सरहदें लग गई ये सब सोचने में
अब कहाँ ढूंढे सुकून जब नहीं है घरौन्दे में

बहती हुई नदिया को तो रोकना चाहता हूँ
पर झिझक सी होती है आंसू पोंछने में

कई मशक्कतों के बाद एक घर बना था
एक मिनट भी नहीं लगा उसे तोड़ने में

आफतों का इतना बड़ा समन्दर है पास में हैं
बहुत वक़्त लगेगा अभी इसे सूखने में

बहुत सारे ज़ख्म हैं मेरे शरीर के दरम्यान
अब दर्द नहीं होता है इन्हें खरोचने में

हालत के हवाले हो गए हैं अब सारे लम्हे
कुछ फायदा नहीं अब इनको सोचने में

कुछ नया कुछ पुराना हाल हो गया है इस तरह
की परत सी जम गई है ये राज़ खोलने में


राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब '

Friday, March 22, 2013

एक शाम..............



इस शाम की महफ़िल में एक और तरन्नुम गा लिया
दाद देते हैं की शायरी की सब ,पर हाल-ए-दिल छुपा लिया

चुभती हुई ख़ामोशी नज़रों में भी भर गई है
बातों की एक रोशनी को हमने बुझा दिया

लफ्ज़ जुबाँ पर आने से यूँ टूट रहे हैं
कि उनकी बेबसी को भी दिल में दबा दिया

कितने वक़्त के साए हमारे पास हैं अब
ख़त्म हो गया वो दौर जो ज़िन्दगी ने भुला दिया

आँखों में जलते हैं सपनों के गलियारे
बेबसी ने ज़िन्दगी से सपनो को हटा दिया

क़तरा - क़तरा एक हँसी की बूँद कहाँ है
हमने तो मुस्कुराहटों को भी रुला दिया

बहुत से अँधेरे बिखरी हवाओं में उड़ भी गए
रात के धुएँ ने हमको ये बता दिया

धुल पड़ी है उन बेघर अरमानों पर भी
जिनके तिनकों से बने घर को हमने गिरा दिया


राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब '



मेरी सुबह को लोग रतिया समझते हैं ....

मेरी सुबह को लोग रतिया समझते हैं  पेड़ की शाखो को वो बगिया समझते हैं  कद्र कोई करता नहीं गजलों की यारों  सब खिल्ली उड़ाने का जरिया समझते हैं...