Friday, August 17, 2018

अटल तो अटल हैं


अटल जी को समर्पित मेरी कविता


अंशुमान अब लुप्त हुआ आज निशा के अंत में
श्वास शून्य हो गयी है आज जीवन तंत्र में
उस युगद्रष्टा के काल खंड में सत्य का वर्चस्व था
आज स्वर्णिम गीतांजलि है उनके स्मृति-वन में

मृत्यु तुम तो अटल हो, तुम्हे बड़ा गुमान है
किन्तु वो भी अटल थे, क्या तुम्हे अनुमान है
उनकी ओजस वाणियों का अजब ही एक ताप था
जिनके प्रस्फुटन से जगता आज हिंदुस्तान है

आज हृदय की श्वास नलियां करुण क्रंदन कर रही
अश्रुधारा बह चली है धरती वंदन कर रही
युग-पुरोधा, दिव्य वाचक, सर्वसम्मत राजनेता
वाक्पटुता, काव्य-शैली, मधुर व्यंगों का चहेता
आज जीवन-युद्ध के संग्राम में अविचल हुआ
दीप बुझकर भी यहाँ पर आज वो उज्जवल हुआ

काल के गर्भ में वो पथ निरंतर कर गए
देह को मृत्यु-समर्पण, दीर्घ अंतर रच गए
आज दर्पण में उनींदी नयनों को क्या देखना
इस सिहरती रात में चन्द्रमा क्या देखना

देखी अंतिम यात्रा की भावभीनी है विदाई
पंक्तियों में, रास्तों में आज भारी है रुलाई
संसृति  के मोह में तो बड़े बड़े डोल गए
आपके व्यक्तित्व को वो अंश भर भी छू पाई

धन्य है वो माता जिनकी गुदड़ी का वो लाल था
निष्कपट जीवन जिया और तेज रक्तिम भाल था
करूणा ले रही हिलोरें, सागर में आज उफान है
शक्तिपुंज के प्रणेता को कोटि कोटि प्रणाम है

जब प्रभाकर-लालिमा भी क्षीण होने लग रही
जब निशाचर रश्मियां विदीर्ण होने लग रही
सूर्य का अमिताभ लेकर सजल लोचन रो रहे 
चित्त के इस शांतिवन में चिरनिद्रा में सो रहे 
उस महामानव का देखो दिशाएं स्वागत करे 
जिसकी ओजस वाणियों से जल रहे अनगिन दिए 

रचनाओं के अद्भुत शिल्पी, नीतिशास्त्र के ज्ञाता हो
वीरों सी प्रखर वाणी और कोमल हृदय के दाता हो
अंतिम पथ पर जाते देखा, मन अब भी ये विस्मित है
चरणों में करुणामय हृदय से श्रद्धासुमन अर्पित है


-राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'






Friday, June 15, 2018

बेचराग होती हैं गलियां.......




बेचराग होती हैं गलियां, सभी दिल टूट गए 
कश्मकश का दौर है, सारे साथी छूट गए

रुके फैसलों से ज़िन्दगी नहीं चला करती है 
और भी ना जाने कितने मंज़र रुक गए

मिला था कुछ अधूरा सा अपनापन कभी
विदा होकर साथियों से, सारे जज़्बात छूट गए

ठिकाना बमुश्किल से घास फूस का ही बनाया था 
वो बड़ी बेदर्दी से मेरा घर फूंक गए

पाया कि अक्ल में समझदारी का अकाल है 
और दिमाग की नसों के शैवाल सूख गए

ये अश्क भी समंदर का अक्स होते हैं 
ज़िन्दगी के इस मुहाने पर इन्ही में डूब गए

ग़लतफ़हमी थी कि होशियारी आ गयी है हमको 
अनाड़ी ही थे जो हर मामले में चूक गए

सांस के चलने से ज़िन्दगी का एहसास हुआ 
गनीमत है कि मरने की खैर खबर पूछ गए

आसां नहीं हैं इस तरह हर पल को समेटना 
लम्हे भी देखो अब वक से रूठ गए

वो मेरे आशियाने में आने से कतराते हैं 
और दुश्मनो की महफ़िल में बहुत खूब गए

अब हालात पर अपने उबकाई से आती है
सचमुच इस ज़िन्दगी से हम इतना ऊब गए


राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'

उस बुझते दिए की.......


उस बुझते दिए की साख क्या होगी
रात से अँधेरा जो उधार लाया

सलीका तो मैंने भी सीखा नहीं
बेहयाई की फितरत को साथ लाया

एक पहर धूप क्या ज़्यादा हुई
सूरज को खुद पर गुमान आया

चेहरा भी मेरा बदरंग सा हो गया
मैं जल्दी से शीशे में उतार लाया

लफ़्फ़ाज़ी की आदत भी कहीं छूटती है भला
हक़ीक़त का उसने यूँ मज़ाक उड़ाया

मिज़ाज कुछ बेतरतीब से हो चले हैं
भौंहों में गुस्से का ग़ुबार आया

उसके वजूद की शिनाख्त नहीं हुई
इसीलिए मरने का ख्याल आया

रुआँसा होकर निकला मैं वहां से
जहाँ बस नाउम्मीदी और इंतज़ार पाया

अब मेरे जिस्म में रूह का सन्नाटा  है
लगता है बहुत दिनों बाद बुखार आया

- राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'

Tuesday, June 5, 2018

यूँ ज़िन्दगी से......

यूँ ज़िन्दगी से मुलाकात का बहाना था

बस आखिरी लम्हों में वक़्त को बुलाना था


मुसलसल था सफर और शिकायतें भी कई थी

याद भी करें तो क्यों, आखिर उन्हें भुलाना था


उस चेहरे से झिझक की त्योरियां उतर गयी

हमें तो बस आँखों का सूरमा दिखाना था


सांस भी भूली हुई सी कहानी का हिस्सा है

ज़िन्दगी के टुकड़ों को समेट कर लाना था


कुछ वजूहात रहे होंगे, तभी तो वो चुप रहे

कोई राज था जो उनको छुपाना था


अब खानाबदोशी का आलम ये हो गया है

कि सर पर बस आसमां का शामियाना था


वो तालीम भी किसी के काम नहीं आयी

जिसकी रवायत में इंसानियत का फ़साना था


ये नफरतों का तर्जुमा है कि लोग अब पूछते नहीं

उनका मकसद तो हमें नज़रों से गिराना था

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'



तेरी आवाज़

तेरी आवाज़ से तन्हाई में जो खलल होता है

वही आजकल मेरे जीने का सबब होता है


तीखी नज़रों से सामना होता है मेरा रोज़

इस तरह दिन गुज़रना बड़ा अजब होता है


ये लगाव है या अच्छे वक़्त का इशारा

पहली पसंद का एहसास कुछ अलग होता है


एक मुस्कराहट से पूरे दिन का खुशनुमा होना

ये करिश्मा भी बड़ा ग़ज़ब होता है


खुशबू में घुल गया है ज़िन्दगी का मौसम

हज़ारों फूलों से बेहतरीन कँवल होता है


परेशां है ज़हन कि इधर-उधर भटकता है

सुकून भी न जाने क्यों बेअसर होता है


हंसी भी रोज़ न जाने कितने आंसुओं को भुलाती है

ख्वाबों में आजकल नया महल होता है


- राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब' 

Sunday, January 21, 2018

घुटन......


खुलती हवाएं घुटन से भरी हैं
ये बागों की कलियाँ चुभन से भरी हैं

शज़र की शाखों में पत्ते नहीं हैं
ये राहें तो उजड़े चमन से भरी हैं

ज़मीं तो हकीकत से कोसों परे है
सितारों की किस्मत गगन से भरी है

चले जा रहें हैं कि मंज़िल नहीं है
दिशाएं भी देखो जलन से  भरी हैं

न साथी, न यादें, न जीवन का किस्सा
मातम की बातें ज़हन में भरी हैं

साँसें तो जैसे पिंजड़े में बंद है
फ़िज़ाएं धुएं की किरण से भरी है

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब' 

Thursday, December 28, 2017

ज़िंदगीनामा -२


बहुत से अंधेरों में चेहरा दिखा है 
यूँ रातों के चलने से पहरा बढ़ा है 

कोई तो मेरे घर में आए या जाए 
मैं सोचता हूँ ये यूँ ही गाहे -बगाहे 
मगर दिल के अंदर का दायरा घटा है 

ज़ुबानों से कितने ही हमले सहे हैं
ये तरकश के तीरों के जितने बड़े हैं 
मगर हौसलों से ये जीवन अड़ा है 

कितनी दलीलें लिफाफे में बंद थी
मुझे सिर्फ चुप्पी की दुनिया पसंद थी 
कहाँ से ये बातों का जमघट बढ़ा है 

धरती की शह थी या बादल था ज़िद्दी 
जहाँ पर मुझे गीली मिटटी मिली थी 
उसी से तो मेरा घरौंदा बना है 

ख्वाबों की रहमत भी खारिज हुई है 
मरने की जब से गुज़ारिश हुई है 
दर्द का बिस्तर लगा कर रखा है 

जहाँ तक मैं जाऊँ नज़र झुक रही है 
यूँ पलकों की छत में कहाँ चुप रही है 
समंदर है छोटा या पैमाना बड़ा है 

मायूसी नहीं है ये तो किस्मत बनी है 
ये रतिया अँधेरी वहीँ की वहीँ है 
नींदों से ऐसे रिश्ता घटा है 

कागज़ के टुकड़ों में सिमटा हुआ हूँ 
धूलों की चादर में लिपटा हुआ हूँ 
मेरा अक्स जैसे की खो सा गया है 

इधर आंसुओं से ये दरिया बहेगा 
उधर यादों के घर में सहरा बंधेगा 
ये सौदा तो लगता बड़ा ही खरा है 

कई दिन बिताये खड़े हैं शहर में 
मगर छुप रहे हैं सवालों के घर में 
ये कैसा है मंज़र जो मुझको दिखा है 

ये ग़ुरबत का फैला हुआ क्या असर है 
यूँ गर्दिश में रहना सहा सा हुआ है
शहरों में मातम सा पसरा हुआ है  

बारिश की धरती कि गन्दा बिछौना 
कहाँ पर निकलता है मिटटी से सोना 
उसी पर तो सारा मुक्कद्दर लगा है 

नहीं तो नहीं है, मगर हाँ कहाँ है 
मेरे लैब तो चुप है, फिसलती ज़ुबाँ है 
ये कैसा है संगम किधर से बना है 

उतरती नहीं है ये पलकों की रंजिश 
लगा जो रखी है ये अश्कों की बंदिश 
इन्ही से तो आगे को होता बुरा है 

बहुत थक गया हूँ पलों को ही गिनते 
अगर रह भी जाते समय से संभलते 
नहीं फिर कहीं कोई दुखड़ा पड़ा है 

अश्कों के बहने से भी तिश्नगी है 
ज़िंदा है यादें यही ज़िन्दगी है 
इसी ने तो हमको सहारा दिया है 

ये चिट्ठी नहीं हैं , ये अक्षर की दुनिया 
ये प्रेमों के निर्झर, ये काँटों की बतिया 
ये जीवन जला है या बुझता गया है 


राजेश बलूनी 'प्रतिबम्ब'



मेरी सुबह को लोग रतिया समझते हैं ....

मेरी सुबह को लोग रतिया समझते हैं  पेड़ की शाखो को वो बगिया समझते हैं  कद्र कोई करता नहीं गजलों की यारों  सब खिल्ली उड़ाने का जरिया समझते हैं...