Monday, July 19, 2021

कुछ सहमे सहमे से आज हालात हैं ...

 









कुछ सहमे सहमे से आज हालात हैं 

जाने किस घड़ी के सारे लम्हात है 


टूट हुए लफ़्ज़ों से कहानी नहीं बनती 

बिखरे हुए सारे मेरे अल्फ़ाज़ हैं 


अभी तो परेशान होने का सफ़र शुरू हुआ 

मुसीबतों का ज़िंदगी मे अभी आगाज़ है 


सारी बातें सबके सामने बोल नहीं सकता 

मेरी आँखों मे जज़्ब कुछ अनकहे राज़ हैं 


किस सवेरे की बात करते हो जो सपनों मे है 

यहाँ तो हक़ीक़त मे काली घानेरी रात है


खुलकर कोई अपनी आपबीती नहीं कहता 

कुछ लोगों के सिमटते हुए जज़्बात हैं 


ऐसा कौन है जो तुमको मुँह लगाएगा 

तुम्हारा समय तो वैसे ही बर्बाद है 


शब्दों के बनिस्बत नज़रों का लिहाज़

कुछ इसी तरह से अपने अंदाज़ हैं 


राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'



  


Thursday, May 20, 2021

थमे तुम जिस जगह ....




थमे तुम जिस जगह पर वहां भी रास्ता निकलता है 

मगर तुम कदम आगे बढ़ा नहीं पाए 

 

मैने तो ईंट पत्थर इकट्टा कर लिए थे 

तुम ही मेरा घर बना नहीं पाए 


क्या त्योहार , क्या खुशी, अब पता नहीं चलती 

हम अपना आंगन दियों से सजा नहीं पाए 


दर्द भी सीने में जज्ब कर रखे हैं 

कोई कितना भी पूछे पर बता नहीं पाए


बहुत कोशिश की लोगों ने भटकाने की 

पर मुझे अपने इरादों से डिगा नहीं पाए


जमाना मुझे कोसने गिराने के लिए खड़ा था 

पर हिम्मत है कि वो गिरा नहीं पाए 


रोज यहां पर जुल्म होता है बेधड़क 

उस से लड़ने की हिम्मत हम दिखा नहीं पाए 


रहने को तो कुत्ता भी आदमी के साथ रहता है 

पर इंसान ही इंसान से दिल लगा नहीं पाए


राजेश बलूनी प्रतिबिंब




















Wednesday, October 21, 2020

बेपरवाह

 








बेपरवाह है मिज़ाज और दिल सुस्त हो गया

कौन है जो यहाँ पर पूरा दुरुस्त हो गया


अर्श से फिसलता एक ज़र्रा चाँद का

ज़मीं पर न जाने कहाँ खो गया


बगैर हाथ उठाए दुआएं मांगता हूँ

तहज़ीब और सलीका कहाँ छोड़ गया


जागने इंतज़ार में है के सुस्त आँखें

सोचते सोचते मैं फिर से सो गया


एक ठण्डी छाँव लम्हो को सजाती है

और एक धधकता पल मौत को हो गया


किश्ते हैं सांसों की जो बची है आस-पास

ज़िन्दगी को कबसे ये धोखा हो गया


हर जगह धूल का समंदर फैला है

साफ़ मौसम न जाने कहाँ खो गया


-राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब' 


 


 


 

Wednesday, February 26, 2020

ज़माने का ज़ोर है...














ज़माने का ज़ोर है कि टूट जाऊं
अपनी दहलीज पर ही रुक जाऊं

तसल्ली नहीं होती उसे जब भी कुछ करूं
उसका इरादा है कि झुक जाऊं

पहले से ज़्यादा महीन हो चुका हूँ
अब क्या चाहती हो, मिट जाऊं

मेरे चेहरे पर शिकन अपना रुआब दिखाती है
और तुम कहती हो कि मुस्कुराऊं

अब कौन सा पैंतरा सोच रही हो
तुम्हारा बस चले तो मैं फुक जाऊं

बेवजह के शिकवे भी इसलिए हैं
तुम चाहती हो तुमसे दूर जाऊं

मेरे दर्द  से तुझे फर्क पड़े मैंने नहीं देखा
बस तेरी उम्मीद पर खरा उतर जाऊं

जब हमारा साज़ ही बेसुरा है
तो तेरे सुर से सुर क्यों मिलाऊं

थोड़ी इज्जत और प्यार की उम्मीद थी
तेरे ऐसे करम है कि भूल जाऊं

अब ज़िन्दगी को ऐसे झेल रहे हैं
कि समझ नहीं आता क्या बताऊं

-
राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'


Thursday, November 28, 2019

तसल्ली


मिले इस तरह से कि कई ज़द खुलने लगी
मुझे देखकर उनकी सूरत उतरने लगी

लगाया नहीं था अंदाज़ा कि इतनी जल्दी मिलेंगे
जब मिले तो पैरों की ज़मीन सिमटने लगी

वो बुज़दिल हैं जो बिछड़ने पर रोते रहते हैं
हमारे लिए तो ज़िन्दगी फिर से खिलने लगी

किसी के होने से फर्क पड़ता था पहले
अब बेफ़िक्र ये शख्सियत होने लगी

तराशे थे कई पत्थर कि  हीरा नसीब होगा
मिटटी के जिस्म की मिटटी निकलने लगी

हमेशा दौर एक सा कहाँ  रहता है यार 
इसी तरह अपनी भी किस्मत बदलने लगी

रग़ों में खून का उबाल ज़रूरी है आजकल
तभी तो हर बात पर चिंगारी भड़कने लगी

बेहोश रहे और वक़्त की कीमत नहीं समझी
इसलिए तो अब जिंदगी बोझ लगने लगी

सोचते हैं कि हर अंधेरे के बाद रौशनी होगी
कुछ इस तरह से मुझको तसल्ली होनी लगी

- राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'

Friday, October 25, 2019

सोचा हुआ हो जाए, ये हमेशा नहीं होता....



सोचा हुआ हो जाए, ये हमेशा नहीं होता
हर किसी का मन यहाँ एक सा नहीं होता

बहुत ख्वाब थे कि ज़िन्दगी बड़ी आसान सी होगी
मुश्किल से न गुज़रे, कोई दिन ऐसा नहीं होता

संभलकर बोलना और संभलकर चलना पड़ता है
जैसा हम सोचते हैं ज़िन्दगी का सफर वैसा नहीं होता

लाख समझाया कि मेरी इरादों में हमेशा नेकी रहती है
इतना कहने पर भी उसको भरोसा नहीं होता

अभी शुरू में ही तकलीफों की झलकियां दिख गई
मुझे कुछ दिन आराम मिले, वैसा नहीं होता

मैं तो अपनी अकलियत को फिर भी सुधार लूँ
पर उसके रवैये में बदलने का जज़्बा नहीं होता

अपने ही करम थे जो आजकल डरे सहमे रहते हैं
दूसरों की गलतियों का यहाँ मसला नहीं होता

- राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'




Friday, July 12, 2019

ढले सच के सांचों में तो....



ढले सच के सांचों में तो उभर गए
वक़्त रहते हम खुद सुधर गए

रही सांस बाकी अब सुकून होगा
तकलीफ के दिन अब गुज़र गए

उम्मीद थी कि वो बड़ा ज़हीन है
बेवकूफी की और दिल से उतर गए

ये गनीमत है कि हालात ठीक हुए
और ज़िन्दगी के मसले सुलझ गए 

उसकी दोस्ती का पैमाना मोहब्बत है
और देखते ही देखते हम संवर गए

मैं सड़क पर कंकरों को उठाता हूँ
ये सोचकर कि  यहाँ रास्ते निकल गए

हंसी का भी अपना एक स्वाद होता है
शहद के मर्तबान जैसा निखर गए 

चोट तो ज़िन्दगी का हिस्सा रहेगी
दर्द के किस्से अब उखड गए

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'  

मेरी सुबह को लोग रतिया समझते हैं ....

मेरी सुबह को लोग रतिया समझते हैं  पेड़ की शाखो को वो बगिया समझते हैं  कद्र कोई करता नहीं गजलों की यारों  सब खिल्ली उड़ाने का जरिया समझते हैं...